Thursday, January 19, 2012

Chaadni chaat par chal rahi hogi


चांदनी छत पर चल रही होगी 
अब अकेली टहल रही होगी

फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा 
वो बर्फ सी पिघल रही होगी 

कल का सपना बहुत सुहाना था 
ये उदासी ना कल रही होगी 

सोचता हूँ की बंद कमरे में 
एक शमां सी जल रही होगी 

तेरे गहनों सी खन खनाती थी 
बाजरे की फसल रही होगी 

जिन हवाओं ने तुझ को दुलराया 
उन में मेरी ग़ज़ल रही होगी