अस्तित्व की तलाश में भटकता रहा मैं,
कभी मंदिर कभी मस्जिद फिरता रहा मैं;
ना जाना कि प्यार है नाम अल्लाह राम का,
ना जाना कि हर इंसान समान शाम सा;
लगता है मेरे दिल में कोई नश्तर चुभा सा,
देखता है जब टुकड़े दिलों के होता हुआ;
क्यों इंसा के दिलों में है नफरत भरी हुई,
क्यों प्यार सिमटता हुआ "मैं" के पैमाने में;
हे मुरारी हे मुहम्मद तुमको आना होगा वापस,
तोडनी होंगी ये बेड़ियाँ भरने होगें हर जख्म.
कभी मंदिर कभी मस्जिद फिरता रहा मैं;
ना जाना कि प्यार है नाम अल्लाह राम का,
ना जाना कि हर इंसान समान शाम सा;
लगता है मेरे दिल में कोई नश्तर चुभा सा,
देखता है जब टुकड़े दिलों के होता हुआ;
क्यों इंसा के दिलों में है नफरत भरी हुई,
क्यों प्यार सिमटता हुआ "मैं" के पैमाने में;
हे मुरारी हे मुहम्मद तुमको आना होगा वापस,
तोडनी होंगी ये बेड़ियाँ भरने होगें हर जख्म.
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